गांवों में पानी के बहाव के लिए बनाया जाए मैप 

प्रश्न : पिछले एक दशक से तेजी से जलस्तर घट रहा है। इसको रोकने के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए? 

उत्तर : घटते जलस्तर को रोकने के लिए सबसे पहले खेतों की ट्यूबवेल से सिंचाई कम करनी होगी क्योंकि खेती की सिंचाई में 80 फीसद भू-गर्भ जल का उपयोग होता है। रसायनिक खेती करने पर खेतों में पानी की जरूरत अधिक पड़ती है। जमीन में नमी नहीं रहती है। इसलिए जैविक खेती को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। यह व्यक्ति और खेत दोनों के लिए अच्छी है।

प्रश्न : जल संचय के लिए गांव-गांव में तालाब खुदवाए गए हैं, लेकिन उसके बावजूद जल संचय नहीं हो रहा है? 

उत्तर : गांवों में जहां पर तालाब खोदे गए हैं। वहां पर पानी के बहाव का ख्याल नहीं रखा गया है। तालाबों में बारिश का पानी पहुंचता ही नहीं है। इसलिए गांवों के पानी के बहाव का मैप होना चाहिए। उसके अनुसार तालाब बनवाए जाने चाहिए। स्थानीय लोगों का सुझाव लिया जाना चाहिए। क्योंकि उनसे ज्यादा कोई पानी के बहाव के बारे में नहीं जानता है। 

प्रश्न : जल संचय में पेड़ों की कितनी भूमिका होती है। इस दिशा में क्या काम किया जाना चाहिए? 

उत्तर : पेड़ों के माध्यम से ही सबसे ज्यादा वाटर रिचार्ज होता है। तालाबों की तुलना में पौधरोपण पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। पौधरोपण केवल अभियान तक सीमित न रहे। इसकी जिम्मेदारी महिलाओं को दी जानी चाहिए। क्योंकि उसमें संरक्षण की भावना अधिक होती है। पौधरोपण में स्कूली बच्चों को भी जोड़ने की जरूरत है। 

प्रश्न : जहां पर एक-एक, दो-दो किलोमीटर तक कोई गांव नहीं है। वहां पर जल संचय कैसे किया जाए? 

उत्तर : ऐसे क्षेत्रों में ‘खेत तालाब’ की अवधारणा पर काम किया जाना चाहिए। दस या 15 लोगों के खेत के बीच तालाब बनाया जाना चाहिए। इसके लिए उनसे थोड़ी-थोड़ी जमीन लेनी चाहिए। बरसात में जब उस तालाब में पानी रहेगा तो वाटर रिचार्ज होगा। जलस्तर खुद-ब-खुद बढ़ेगा। 

प्रश्न : अधिक बारिश होने पर बाढ़ की स्थिति पैदा हो जाती है। इसके लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए? 

उत्तर : प्रयागराज में टोंस, बेलन, मनसैता, वरुणा, बकुलाही, लपरी नदी समेत कई छोटी नदियां हैं जिनका स्वरूप बदल गया है। वे नाले में तब्दील हो गई हैं। बरसात में जब उसमें पानी आता है तो समाहित नहीं हो पाता है। बाद में वह बाढ़ के रूप में तब्दील हो जाता है। प्रयागराज में अगर छोटी नदियां पुनर्जीवित हो जाएं तो बाढ़ की समस्या लगभग खत्म हो जाए।

जासं, प्रयागराज : बीते एक दशक से जलस्तर तेजी से गिर रहा है। तमाम छोटी नदियों का अस्तित्व खत्म होने की कगार पर है। उनका स्वरूप बरसाती नाले का रह गया है। सरकार गांवों में तालाब तो खुदवा रही है, लेकिन ज्यादातर में पानी इकट्ठा नहीं हो रहा है। यह कहना है गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के अर्थशास्त्र विभाग के प्रो. सुनीत सिंह का। दैनिक जागरण के सप्ताह के साक्षात्कार में जल संचयन को लेकर उन्होंने बेबाक राय रखी। कहा कि जल संचय के लिए सबसे जरूरी है कि गांवों में पानी के बहाव का मैप हो। उसके अनुसार तालाब खोदे जाएं। पौधरोपण की जिम्मेदारी महिलाओं दी जाए क्योंकि उनमें संरक्षण की भावना अधिक होती है।

सप्ताह का साक्षात्कार

पंत संस्थान के प्रो. सुनीत सिंह बोले, महिलाओं को देनी चाहिए पौधरोपण की जिम्मेदारी